
सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा और पत्नी को जला देने जैसी क्रूर घटनाओं पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले समाज की गंभीर सच्चाई को उजागर करते हैं और यह दर्शाते हैं कि महिलाओं की आजादी आज भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इस पर सख्त कार्रवाई जरूरी है।
अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई है जब देशभर में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर बहस जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है, जिससे महिलाओं को बराबरी और सुरक्षा का अधिकार पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है। यह बयान न केवल न्यायपालिका की चिंता को दर्शाता है, बल्कि समाज और प्रशासन के लिए भी एक चेतावनी है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और संबंधित एजेंसियों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का सही तरीके से पालन हो और पीड़ितों को त्वरित न्याय मिल सके। साथ ही, समाज में जागरूकता बढ़ाने और मानसिकता में बदलाव लाने की भी जरूरत बताई गई, ताकि महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं को जड़ से खत्म किया जा सके।



