
सूर्य के अंदर ऊर्जा पैदा करने वाली प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित तरीके से दोहराने की कोशिश दशकों से वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही है। न्यूक्लियर फ्यूजन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीक है। भारत भी इस क्षेत्र में लगातार रिसर्च और तकनीकी विकास कर रहा है।
भारत के फ्यूजन रिसर्च कार्यक्रम में SST-1 यानी Steady State Superconducting Tokamak की अहम भूमिका है। टोकामक एक ऐसी मशीन है, जिसमें बेहद गर्म प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्र की मदद से नियंत्रित रखने का प्रयास किया जाता है।
फ्यूजन प्रक्रिया में हल्के परमाणु नाभिक आपस में जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं और इस दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। यही प्रक्रिया सूर्य और दूसरे तारों में प्राकृतिक रूप से होती है। वैज्ञानिक इसी सिद्धांत को नियंत्रित वातावरण में इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
इस क्षेत्र में भारत की प्रगति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सफल फ्यूजन तकनीक भविष्य में ऊर्जा उत्पादन का एक नया विकल्प बन सकती है। फ्यूजन ऊर्जा को संभावित रूप से कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा तकनीक माना जाता है, हालांकि इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल करने के लिए अभी कई वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग चुनौतियां बाकी हैं।
प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर रखना फ्यूजन रिसर्च की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। अत्यधिक तापमान पर मौजूद प्लाज्मा को नियंत्रित करने के लिए शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र और अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत होती है। इसी वजह से टोकामक आधारित शोध को काफी महत्व दिया जाता है।
भारत में फ्यूजन रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों ने प्लाज्मा, सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट और हाई-पावर हीटिंग सिस्टम जैसी तकनीकों पर काम किया है। इसमें हाई-पावर माइक्रोवेव यानी जाइरोट्रॉन जैसी प्रणालियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिनका इस्तेमाल प्लाज्मा को गर्म करने में किया जाता है।
‘आर्टिफिशियल सन’ शब्द सुनने में भले ही बेहद आकर्षक हो, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इसका मतलब सूर्य को हूबहू बनाने से नहीं है। इसका आशय सूर्य जैसी न्यूक्लियर फ्यूजन प्रक्रिया को नियंत्रित परिस्थितियों में समझने और उपयोग करने की कोशिश से है। भारत की मौजूदा प्रगति इसी लंबे वैज्ञानिक लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।



