लट्ठे दी चादर: पंजाबी लोकगीत में छिपी प्रेम की कहानी

‘लट्ठे दी चादर’ की खासियत इसकी सरल भाषा और प्रेम से जुड़े भाव हैं। गीत में महिला अपने प्रेमी के सामने अपनी भावनाओं को संकोच, नजाकत और शरारत के साथ व्यक्त करती है। यही वजह है कि यह लोकगीत पीढ़ियों से पंजाबी शादी-ब्याह की महफिलों का हिस्सा बना हुआ है।
इस लोकगीत के नाम में ‘लट्ठे’ का अर्थ सूती कपड़े से जुड़ा है। गीत में प्रेमिका अपने माहिया यानी प्रेमी से कहती है कि वह रूठकर दूर न जाए और सामने आकर उससे बात करे। इसके बोलों में प्रेम के साथ हल्की छेड़छाड़ और घरेलू जीवन की सहज तस्वीर भी दिखाई देती है।
‘लट्ठे दी चादर’ की धुन पर शादी समारोहों में दुल्हन और उसकी सहेलियों के डांस की परंपरा भी देखने को मिलती है। इसकी लोकप्रियता सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रही, बल्कि अलग-अलग दौर के गायकों ने इसे अपनी आवाज और अंदाज में पेश किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस लोकगीत को मूल रूप से सुरिंदर कौर और प्रकाश कौर की आवाज से पहचान मिली। बाद में जगजीत सिंह, गुरदास मान, नेहा भसीन और हर्षदीप कौर जैसे कलाकारों ने भी इसे अलग-अलग अंदाज में प्रस्तुत किया, जिससे यह गीत नई पीढ़ियों तक पहुंचता रहा।



