उज्बेकिस्तान में चीनी J-10CE, क्या मध्य एशिया में कमजोर हुआ रूस का दबदबा?

मध्य एशिया में रूस के पारंपरिक रक्षा प्रभाव को अब चीन से नई चुनौती मिलती दिखाई दे रही है। उज्बेकिस्तान में चीनी J-10CE लड़ाकू विमानों की मौजूदगी सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या ताशकंद अब अपनी सैन्य जरूरतों के लिए मॉस्को पर पहले की तरह निर्भर नहीं रहना चाहता।
हाल ही में उज्बेकिस्तान के करशी-खानाबाद एयरबेस पर छह चीनी J-10CE विमानों को सार्वजनिक रूप से दिखाए जाने की खबर सामने आई। ये विमान 28 अगस्त को उज्बेकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े प्रदर्शन में नजर आए। इसे चीनी लड़ाकू विमानों की उज्बेकिस्तान में मौजूदगी का अब तक का सबसे स्पष्ट सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है।
J-10CE चीन के Chengdu J-10 परिवार का निर्यात संस्करण है। यह बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है और पाकिस्तान पहले से इसका प्रमुख विदेशी ऑपरेटर है। उज्बेकिस्तान के मामले में रिपोर्टों में 24 विमानों के संभावित सौदे की बात सामने आई है, लेकिन बीजिंग और ताशकंद ने अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
उज्बेकिस्तान की वायुसेना लंबे समय से सोवियत दौर के MiG-29 और Su-27 जैसे विमानों पर निर्भर रही है। ऐसे में चीनी लड़ाकू विमान को अपनाना उसके सैन्य आधुनिकीकरण और सप्लायर देशों में विविधता लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
रूस के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सोवियत संघ के विघटन के बाद मध्य एशिया के कई देशों की सेनाएं सोवियत हथियार प्रणालियों, प्रशिक्षण और रखरखाव ढांचे से जुड़ी रही हैं। रूस लंबे समय तक इस क्षेत्र का प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता रहा है। अब चीन धीरे-धीरे इस बाजार में अपनी जगह मजबूत कर रहा है।
हालांकि इसे सीधे तौर पर रूस से उज्बेकिस्तान की दूरी के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। ताशकंद की नीति अधिक रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने की भी हो सकती है। यानी वह रूस के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखते हुए चीन से आधुनिक सैन्य तकनीक हासिल कर अपने विकल्प बढ़ाना चाहता है।
J-10CE की मौजूदगी से चीन को मध्य एशिया में सिर्फ हथियार बेचने से आगे बढ़कर रक्षा सहयोग बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। लड़ाकू विमानों के साथ प्रशिक्षण, हथियार, रखरखाव और तकनीकी सहयोग जैसी जरूरतें भी जुड़ी होती हैं। इससे किसी देश की दीर्घकालिक सैन्य निर्भरता पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि मध्य एशिया में रूस का दबदबा पूरी तरह खत्म हो गया है। लेकिन उज्बेकिस्तान में चीनी लड़ाकू विमानों की संभावित तैनाती यह जरूर दिखाती है कि क्षेत्र का रक्षा बाजार बदल रहा है। चीन की बढ़ती सैन्य पहुंच और रूस की पारंपरिक भूमिका के बीच आने वाले वर्षों में मध्य एशिया का रणनीतिक संतुलन और दिलचस्प हो सकता है।



