नेपाली लोगों का बालेन शाह से मोहभंग? 150 दिन में क्यों घटा Gen-Z PM का असर

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सत्ता संभालने के बाद जिस बदलाव और नई राजनीति का वादा किया था, अब उसी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कभी Gen-Z के सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे के तौर पर उभरे शाह को 150 दिन के भीतर ही विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। उनकी सरकार से युवाओं को तेज सुधार, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई और रोजगार के बेहतर अवसरों की बड़ी उम्मीदें थीं।
शाह की मुश्किलों की शुरुआत सरकार के भीतर अस्थिरता से भी हुई। सत्ता संभालने के शुरुआती हफ्तों में ही दो मंत्रियों के इस्तीफे ने उनकी सरकार की पारदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े किए थे। एक मंत्री पर पद के दुरुपयोग के आरोप लगे, जबकि दूसरे ने अपने निवेश और व्यक्तिगत लेनदेन को लेकर उठे सवालों के बीच इस्तीफा दिया।
इसके बाद सरकार के कुछ फैसले सीधे युवाओं और आम लोगों के विरोध का कारण बने। काठमांडू में अतिक्रमण हटाने और नदी किनारे बसे लोगों को हटाने की कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए। जुलाई में एक राइड-शेयरिंग चालक की मौत के बाद युवाओं का गुस्सा फिर सड़कों पर दिखाई दिया और सरकार से जवाबदेही की मांग उठी।
बालेन शाह के सामने एक और बड़ी चुनौती संसद से उनकी दूरी को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने शुरुआती 39 संसदीय बैठकों में केवल पांच में हिस्सा लिया। इसी मुद्दे पर नेपाल के स्पीकर ने उन्हें 26 अगस्त को संसद में उपस्थित होकर सांसदों के सवालों का जवाब देने के लिए कहा है।
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि बालेन शाह की लोकप्रियता पूरी तरह खत्म हो गई है। उन्हें अब भी नेपाल की पारंपरिक राजनीति से अलग युवा नेतृत्व के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन सत्ता में शुरुआती 150 दिनों ने यह जरूर दिखा दिया है कि Gen-Z के आंदोलन से लोकप्रिय होना और सरकार चलाकर उस उम्मीद को कायम रखना दो अलग चुनौतियां हैं।



