भारत को Suez Canal की जरूरत नहीं? Arctic Route से बढ़ेगा व्यापार

भारत समुद्री व्यापार के लिए एक नए और रणनीतिक रास्ते की ओर बढ़ रहा है। रूस के उत्तरी तट से होकर गुजरने वाला Northern Sea Route (NSR) अब भारत के लिए भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक 2027 में इस आर्कटिक मार्ग से पहला पायलट कार्गो जहाज भेजने की योजना है।
Northern Sea Route एशिया और यूरोप के बीच पारंपरिक Suez Canal मार्ग की तुलना में काफी छोटा समुद्री रास्ता है। आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने के कारण इस मार्ग की मौसमी उपलब्धता बढ़ी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है।
चीन इस रूट पर नियमित कंटेनर सेवा शुरू कर चुका है, जबकि रूस लंबे समय से इसे बड़े व्यापारिक कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में भारत का जुड़ना इस मार्ग के आर्थिक और रणनीतिक महत्व को और बढ़ा सकता है।
भारत के लिए यह पहल रूस के साथ व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ समुद्री सप्लाई चेन को विविध बनाने का अवसर भी है। मौजूदा समय में Suez Canal और अन्य पारंपरिक समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव, सुरक्षा जोखिम और व्यवधानों का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है। ऐसे में वैकल्पिक मार्ग महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
हालांकि Northern Sea Route को फिलहाल Suez Canal का सीधा विकल्प मानना जल्दबाजी होगी। यहां मौसम बेहद कठोर है और कई महीनों तक समुद्री बर्फ की स्थिति चुनौतीपूर्ण रहती है। जहाजों को विशेष तकनीकी क्षमता और कई क्षेत्रों में आइसब्रेकर सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
भारत पहले ही चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे के जरिए रूस के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने पर काम कर रहा है। इस कॉरिडोर के बाद Northern Sea Route में संभावित भागीदारी भारत-रूस समुद्री व्यापार को एक और दिशा दे सकती है।
इसलिए खबर का मतलब यह नहीं है कि भारत अब Suez Canal का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर देगा। बल्कि Northern Sea Route को एक अतिरिक्त रणनीतिक और वैकल्पिक समुद्री मार्ग के रूप में विकसित करने की कोशिश की जा रही है।



