पृथ्वी की गति में हाल ही में ऐसा बदलाव देखा गया है जिसने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पृथ्वी अब पहले से तेज़ी से घूमने लगी है, जिससे दिन के कुल समय में मामूली लेकिन तकनीकी रूप से बेहद महत्वपूर्ण अंतर आ रहा है।
पहली बार ऐसा हो रहा है जब वैज्ञानिकों को Earth का टाइम टेबल यानी ‘लीप सेकंड’ एडजस्ट करने की ज़रूरत महसूस हो रही है। आमतौर पर पृथ्वी की एक रोटेशन में 24 घंटे लगते हैं, लेकिन अब यह समय धीरे-धीरे कम हो रहा है।
इस बदलाव का असर सैटेलाइट्स, GPS, क्लॉक सिस्टम और डिजिटल नेटवर्क पर पड़ सकता है, क्योंकि वे बहुत ही सटीक समय पर आधारित होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव पृथ्वी के आंतरिक कोर, वायुमंडलीय दबाव या जलवायु परिवर्तन की वजह से हो सकता है।
यदि पृथ्वी की स्पीड यूं ही बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में इंसानों को अपने ‘समय’ को नए तरीके से समझने और व्यवस्थित करने की ज़रूरत पड़ सकती है।
लीप सेकंड वो अतिरिक्त समय होता है जिसे वैज्ञानिकों को तब जोड़ना या घटाना पड़ता है जब पृथ्वी की घूर्णन गति में मामूली बदलाव होता है। आमतौर पर जब पृथ्वी धीमी होती है तो एक अतिरिक्त सेकंड जोड़ा जाता है। लेकिन इस बार मामला उल्टा है—पृथ्वी की रफ्तार बढ़ रही है, जिससे इतिहास में पहली बार एक सेकंड कम करने की बात हो रही है।
यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि हमारी घड़ियां (UTC – Coordinated Universal Time) और पृथ्वी की प्राकृतिक गति में संतुलन बना रहे।
पृथ्वी की रफ्तार में बदलाव कोई मामूली बात नहीं है। GPS सिस्टम, इंटरनेट सर्वर, फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, और यहां तक कि अंतरिक्ष अनुसंधान में भी सबकुछ मिलीसेकंड पर टिका होता है। यदि समय का गणित बिगड़ा, तो तकनीकी सिस्टम फेल हो सकते हैं या उनमें गड़बड़ियां आ सकती हैं।
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर यह बदलाव जारी रहा, तो भविष्य में लीप सेकंड को पूरी तरह हटाना पड़ सकता है या फिर नई समय प्रणाली बनानी पड़ सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके कई संभावित कारण हो सकते हैं:
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पृथ्वी के कोर (Core) में हो रहे परिवर्तन
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ग्लेशियर पिघलने से द्रव्यमान का पुनर्वितरण
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भूकंप या ज्वालामुखी जैसी भूगर्भीय गतिविधियां
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वायुमंडलीय और महासागरीय दबाव में बदलाव
इन सभी फैक्टर्स मिलकर पृथ्वी के रोटेशन में सूक्ष्म, लेकिन असरदार बदलाव ला सकते हैं।



