3811 करोड़ का राजनीतिक चंदा: 9 ट्रस्ट्स के जरिए कंपनियों ने कैसे बांटा पैसा

देश में राजनीतिक फंडिंग को लेकर एक बार फिर बड़ा आंकड़ा सामने आया है। कुल 3811 करोड़ रुपये का राजनीतिक चंदा 9 ट्रस्ट्स के माध्यम से अलग–अलग राजनीतिक दलों तक पहुंचाया गया। इस खुलासे ने कॉरपोरेट दान, ट्रस्ट व्यवस्था और राजनीतिक पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई बड़ी और जानी-मानी कंपनियों ने अपने सीधे नाम से दान देने के बजाय ट्रस्ट्स के जरिए धनराशि दी, जिससे दान की प्रक्रिया औपचारिक और संगठित रूप में पूरी की जा सके। इन ट्रस्ट्स का उद्देश्य राजनीतिक दलों को वित्तीय सहायता देना बताया गया है, हालांकि आलोचक इसे जवाबदेही से बचने का एक तरीका भी मान रहे हैं।
राजनीतिक चंदे में आगे रहने वाली कंपनियों में इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा, खनन और रियल एस्टेट सेक्टर की बड़ी फर्में शामिल रहीं। माना जा रहा है कि चुनावी वर्षों में नीति, परियोजनाओं और कारोबारी माहौल को लेकर कंपनियां राजनीतिक दलों से बेहतर तालमेल चाहती हैं, इसी वजह से फंडिंग में तेजी देखी जाती है। 9 ट्रस्ट्स के जरिए चंदा देने से कंपनियों को एक संगठित प्लेटफॉर्म मिलता है, जहां नियमों के तहत राशि वितरित की जाती है और प्रशासनिक प्रक्रियाएं आसान हो जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रस्ट मॉडल से दान देने के फायदे तो हैं, लेकिन पारदर्शिता सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरती है। आम नागरिक यह जानना चाहता है कि किस कंपनी ने किस दल को कितनी राशि दी और उसके बदले नीतिगत फैसलों पर कितना असर पड़ा। हालांकि मौजूदा नियमों के तहत ट्रस्ट्स को अपनी वित्तीय जानकारी देनी होती है, फिर भी विवरण आम लोगों तक सीमित रूप में ही पहुंच पाता है।
वहीं समर्थकों का तर्क है कि राजनीतिक दलों के संचालन, चुनाव प्रचार और संगठनात्मक गतिविधियों के लिए धन जरूरी है और कॉरपोरेट चंदा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उनका कहना है कि यदि फंडिंग पूरी तरह नियमों के दायरे में हो, तो इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता। कुल मिलाकर, 3811 करोड़ रुपये का यह आंकड़ा बताता है कि राजनीति और कॉरपोरेट जगत के बीच संबंध कितने गहरे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार और चुनाव आयोग पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्या नए कदम उठाते हैं, ताकि राजनीतिक चंदे को लेकर जनता का भरोसा बना रहे।



