US-वेनिजुएला जंग की आहट से कच्चा तेल महंगा होने की आशंका, भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा प्रभाव?

अमेरिका और वेनेजुएला के बीच बढ़ता तनाव अगर जंग का रूप लेता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक कच्चे तेल बाजार पर पड़ सकता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है और अमेरिका लंबे समय से उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता रहा है। किसी भी सैन्य टकराव या सख्त प्रतिबंध की स्थिति में वेनेजुएला से तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने की आशंका है।
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें मांग और आपूर्ति के संतुलन पर निर्भर करती हैं। यदि वेनेजुएला के तेल उत्पादन या निर्यात में कमी आती है, तो बाजार में आपूर्ति घटेगी। ऐसे में ओपेक प्लस देशों पर दबाव बढ़ेगा कि वे उत्पादन बढ़ाएं, लेकिन यह तुरंत संभव नहीं होता। इसी कारण जंग या बड़े भू-राजनीतिक संकट के समय तेल की कीमतें अक्सर अचानक उछल जाती हैं।
भारत की बात करें तो वह अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। हालांकि भारत सीधे वेनेजुएला से बहुत अधिक तेल नहीं खरीदता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का असर उसे जरूर झेलना पड़ता है। अगर कच्चा तेल महंगा होता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है। इसका दबाव रुपये पर भी पड़ सकता है और डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आ सकती है।
इसके अलावा कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी जैसी घरेलू ईंधन कीमतों पर असर पड़ता है। सरकार अगर कीमतें नियंत्रित नहीं करती, तो महंगाई बढ़ सकती है। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भी ऊपर जा सकते हैं। इससे आम जनता की जेब पर सीधा असर पड़ता है।
हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रूस, मध्य-पूर्व और अफ्रीकी देशों से तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई है, जिससे किसी एक देश पर निर्भरता कम हुई है। फिर भी वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने से भारत पूरी तरह बच नहीं सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-वेनेजुएला तनाव लंबा खिंचता है, तो कच्चा तेल महंगा रह सकता है। ऐसे में भारत सरकार को रणनीतिक तेल भंडार, वैकल्पिक ऊर्जा और कूटनीतिक संतुलन जैसे उपायों पर और जोर देना पड़ सकता है।



