छठ पूजा के असली लोकगीत, हर बोल में बिहार की संस्कृति

छठ महापर्व सिर्फ पूजा और व्रत का पर्व नहीं है, बल्कि बिहार की लोक संस्कृति, परंपरा और आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ त्योहार है। इस दौरान घाटों पर गूंजने वाले पारंपरिक लोकगीत छठी मैया और सूर्य देव के प्रति श्रद्धा को व्यक्त करते हैं। इन गीतों में परिवार, संतान, पति और समाज के सुख-समृद्धि की कामना के साथ व्रती की तपस्या और भावनाएं भी दिखाई देती हैं।
आजकल छठ पर्व पर फिल्मों और नए म्यूजिक एल्बम के गीत भी खूब सुनाई देते हैं। हालांकि पारंपरिक छठ गीतों की अपनी अलग पहचान है। ये गीत पीढ़ियों से लोगों के बीच प्रचलित हैं और बिहार की लोकभाषा, जीवनशैली तथा धार्मिक परंपराओं की झलक पेश करते हैं।
‘पहिले-पहिले हम कईनी छठी मैया बरत तोहार’ जैसे गीत में पहली बार छठ व्रत करने वाली व्रती की श्रद्धा और छठी मैया से की गई प्रार्थना को भावपूर्ण तरीके से व्यक्त किया गया है। वहीं ‘केलवा के पात पर’ गीत में अर्घ्य के इंतजार और परिवार के लिए किए जाने वाले कठिन व्रत की भावना सामने आती है।
‘कांच ही बांस के बहंगिया’ छठ की एक महत्वपूर्ण परंपरा से जुड़ा लोकगीत है। इसमें बांस की बहंगी के जरिए प्रसाद और पूजा सामग्री को घाट तक ले जाने की परंपरा का वर्णन मिलता है। इस तरह गीतों में केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि छठ पर्व से जुड़ी रोजमर्रा की पारंपरिक गतिविधियां भी दर्ज हैं।
‘मारबो रे सुगवा धनुख से’ गीत में छठ पूजा के प्रसाद और उसकी पवित्रता से जुड़ी लोककथा का भाव मिलता है। वहीं ‘उगी हे दीनानाथ’ में व्रती की उस प्रतीक्षा को स्वर दिया गया है, जब वह सुबह के अर्घ्य के लिए सूर्य देव के उदय का इंतजार करती है।
इसी तरह ‘चाननी ताने चलले गौरा देई’ जैसे गीतों में छठ घाट की सजावट, चननी और कोसी भरने जैसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है। इन गीतों की खासियत यही है कि इनके शब्द छठ पर्व की धार्मिक आस्था के साथ-साथ बिहार की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।
छठ के पारंपरिक गीतों को सुनने पर व्रत की कठिन साधना, परिवार के प्रति प्रेम, सूर्य उपासना और छठी मैया के प्रति विश्वास की भावनाएं एक साथ महसूस होती हैं। यही वजह है कि आधुनिक दौर में नए छठ गीत लोकप्रिय होने के बावजूद पारंपरिक लोकगीत आज भी लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए हैं।



