Cortisol Test: युवा क्यों करा रहे कोर्टिसोल टेस्ट? जानें कब होती है जरूरत

कोर्टिसोल शरीर का एक महत्वपूर्ण हार्मोन है, जिसे आमतौर पर ‘स्ट्रेस हार्मोन’ कहा जाता है। यह एड्रिनल ग्लैंड से बनता है और शरीर की तनाव प्रतिक्रिया, मेटाबॉलिज्म तथा कई अन्य प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। कोर्टिसोल का स्तर दिनभर एक जैसा नहीं रहता, इसलिए टेस्ट के समय को समझना भी जरूरी है।
युवाओं में कोर्टिसोल टेस्ट को लेकर बढ़ती दिलचस्पी के पीछे तनाव, नींद की समस्या और सोशल मीडिया पर हार्मोन से जुड़ी जानकारी जैसे कारण बताए जा रहे हैं। हालांकि, हर तनाव या थकान का मतलब हाई कोर्टिसोल नहीं होता। एक सामान्य जीवनशैली या मानसिक तनाव के आधार पर खुद से यह टेस्ट कराने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।
कोर्टिसोल की जांच कुछ खास परिस्थितियों में डॉक्टर की सलाह पर की जा सकती है। उदाहरण के लिए, शरीर में कोर्टिसोल की कमी या अधिकता से जुड़ी बीमारी का संदेह होने पर आगे की जांच की जाती है। Cushing syndrome जैसे मामलों में केवल एक सामान्य ब्लड कोर्टिसोल टेस्ट के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जाता; डॉक्टर स्थिति के अनुसार अन्य टेस्ट भी चुन सकते हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्टिसोल टेस्ट की रिपोर्ट को उसके समय के संदर्भ में देखना जरूरी है। सामान्य तौर पर कोर्टिसोल सुबह अधिक और शाम/रात में कम होता है। इसलिए अलग-अलग समय पर किए गए टेस्ट के परिणामों की सीधे तुलना करना सही नहीं हो सकता।
इसलिए अगर किसी व्यक्ति को लगातार ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं जिनसे हार्मोन संबंधी समस्या का संदेह हो, तो डॉक्टर से परामर्श लेकर ही जांच कराना उचित है। केवल सोशल मीडिया पर बताए गए लक्षणों या किसी एक रिपोर्ट के आधार पर खुद से बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।



