
अमेरिका में H1-B वीजा शुल्क बढ़ाने को लेकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ा फैसला अब उनके लिए कानूनी संकट बनता नजर आ रहा है। इस फैसले के खिलाफ अमेरिका के 20 राज्यों ने एकजुट होकर अदालत का रुख किया है। इन राज्यों का कहना है कि H1-B वीजा फीस में बढ़ोतरी न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था, तकनीकी सेक्टर और राज्यों के हितों को भी नुकसान पहुंचेगा।
दरअसल, H1-B वीजा का इस्तेमाल अमेरिका में विदेशी कुशल पेशेवरों को काम पर रखने के लिए किया जाता है। इसमें बड़ी संख्या में आईटी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञ शामिल होते हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान वीजा नियमों को सख्त करने और शुल्क बढ़ाने का उद्देश्य घरेलू रोजगार को प्राथमिकता देना बताया गया था, लेकिन अब राज्य सरकारों का तर्क है कि इससे कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और टैलेंट की कमी पैदा होगी।
कोर्ट में दायर याचिका में राज्यों ने कहा है कि H1-B वीजा फीस बढ़ाने का फैसला बिना पर्याप्त प्रक्रिया और स्पष्ट कानूनी आधार के लिया गया। इससे स्टार्टअप्स, यूनिवर्सिटीज और टेक कंपनियों को नुकसान होगा, जो वैश्विक प्रतिभा पर निर्भर हैं। खासकर कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन और मैसाचुसेट्स जैसे राज्यों में इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, जहां टेक और इनोवेशन सेक्टर अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।
भारतीय पेशेवरों के लिए भी यह मुद्दा बेहद अहम है, क्योंकि H1-B वीजा धारकों में सबसे बड़ी संख्या भारत से आने वाले विशेषज्ञों की होती है। फीस बढ़ने से न सिर्फ कंपनियों की लागत बढ़ेगी, बल्कि वीजा आवेदकों के लिए भी अमेरिका में काम करना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि इस फैसले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई जा रही है।
राज्य सरकारों का यह भी कहना है कि H1-B वीजा प्रोग्राम अमेरिकी कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे रखता है। अगर इसे कमजोर किया गया, तो कंपनियां दूसरे देशों की ओर रुख कर सकती हैं, जिससे अमेरिका को लंबे समय में आर्थिक नुकसान होगा।
अब सबकी नजर कोर्ट के फैसले पर टिकी है। अगर अदालत राज्यों के पक्ष में फैसला देती है, तो ट्रंप प्रशासन से जुड़े इस निर्णय को बड़ा झटका लग सकता है। वहीं, यह मामला अमेरिकी इमिग्रेशन नीति और विदेशी टैलेंट को लेकर चल रही बहस को और तेज करने वाला साबित हो सकता है।



