
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की कहानी वर्षों पुरानी है, लेकिन यह उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंची जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने परमाणु समझौते को लेकर सख्त रुख अपनाया। 2018 में अमेरिका ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते, यानी Joint Comprehensive Plan of Action से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, जिससे दोनों देशों के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए। इसके जवाब में ईरान ने भी परमाणु गतिविधियों को बढ़ाने के संकेत दिए। 2019 और 2020 के दौरान खाड़ी क्षेत्र में कई घटनाएं हुईं, जिनमें तेल टैंकरों पर हमले और अमेरिकी ड्रोन गिराए जाने जैसी घटनाएं शामिल थीं। जनवरी 2020 में अमेरिका ने बगदाद में ड्रोन स्ट्राइक कर ईरानी सैन्य कमांडर Qasem Soleimani को मार गिराया, जिसे ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताया। इस कार्रवाई के बाद पूरे मध्य पूर्व में युद्ध जैसे हालात बन गए। व्हाइट हाउस में लगातार उच्चस्तरीय बैठकें होती रहीं और एयर फोर्स वन के जरिए ट्रंप ने विभिन्न सैन्य ठिकानों का दौरा कर स्थिति की समीक्षा की। पेंटागन और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद संभावित ऑपरेशन की रणनीति तैयार की गई। इस पूरी प्रक्रिया में कूटनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य ताकत—तीनों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि व्यापक युद्ध टल गया, लेकिन अमेरिका-ईरान संबंधों में अविश्वास और गहरा हो गया। ट्रंप के फैसलों ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी और यह स्पष्ट कर दिया कि परमाणु मुद्दे पर अमेरिका किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है।



