ड्रॉइंग रूम की शुरुआत कैसे हुई? जानें विक्टोरियन युग की कहानी

मध्यकालीन यूरोप में घरों का ढांचा आज की तरह अलग-अलग कमरों में बंटा हुआ नहीं था। एक बड़े हॉल में खाना खाने से लेकर मेहमानों से मिलने और दूसरी सामाजिक गतिविधियां करने तक के काम होते थे। बाद में जरूरत के अनुसार घरों में अलग-अलग कमरों का चलन बढ़ा।
जब डाइनिंग रूम का चलन शुरू हुआ, तो खाना खाने के बाद पुरुष अक्सर वहीं बैठकर आपस में बातचीत और सिगार का आनंद लेते थे। महिलाओं के लिए यह माहौल असुविधाजनक माना जाता था, इसलिए वे खाना खत्म होने के बाद दूसरे कमरे में चली जाती थीं।
यहीं से ‘विड्रॉइंग रूम’ शब्द का संबंध सामने आता है। महिलाएं डाइनिंग रूम से ‘विड्रॉ’ यानी अलग होकर जिस कमरे में जाती थीं, उसे विड्रॉइंग रूम कहा जाने लगा। समय के साथ यह नाम छोटा होकर ‘ड्रॉइंग रूम’ बन गया।
ब्रिटिश शासन के दौरान विक्टोरियन जीवनशैली और वास्तुकला का प्रभाव भारत में भी पहुंचा। संपन्न भारतीय परिवारों ने विक्टोरियन शैली के बंगलों में भव्य ड्रॉइंग रूम बनवाने शुरू किए, जिसके बाद यह कमरा भारतीय घरों की पहचान का हिस्सा बन गया।
दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक ब्रिटेन में ड्रॉइंग रूम शब्द का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हो गया है और वहां ‘लिविंग रूम’, ‘सिटिंग रूम’ या ‘लाउंज’ जैसे शब्द ज्यादा प्रचलित हैं। वहीं भारतीय अंग्रेजी में ‘ड्रॉइंग रूम’ आज भी आम बोलचाल का हिस्सा है।



