रसिया: ब्रज की होली के इस लोकगीत में छिपा प्रेम और मस्ती

‘रसिया’ शब्द ‘रस’ से जुड़ा माना जाता है, जिसका संबंध आनंद और प्रेम से है। ब्रज की परंपरा में भगवान कृष्ण को भी ‘रसिया’ कहा जाता है। इन लोकगीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम, नोकझोंक, रासलीला और होली खेलने के प्रसंग प्रमुखता से सुनने को मिलते हैं।
ब्रज में फाल्गुन के दौरान रसिया और होरी की विशेष धूम रहती है। ढोलक, मंजीरा और बड़े नगाड़े जैसे बंब की थाप पर समूह में गाए जाने वाले इन गीतों से होली का माहौल और भी रंगीन हो जाता है।
रसिया की खासियत सिर्फ राधा-कृष्ण की लीलाओं तक सीमित नहीं है। इन गीतों में पति-पत्नी के प्रेम, देवर-भाभी और सास-बहू के रिश्तों के साथ मौसम और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े प्रसंग भी देखने को मिलते हैं। इसी वजह से यह लोकगीत ब्रज के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा बन गया है।
रसिया की एक खास शैली ‘दंगल’ भी है, जिसमें दो गायन मंडलियां आमने-सामने बैठकर सवाल-जवाब के अंदाज में गीत गाती हैं। ब्रजभाषा, लयबद्ध धुन और पारंपरिक वाद्ययंत्र इस शैली को अलग पहचान देते हैं।
ब्रज की होली का साहित्य और लोकसंगीत दोनों ही राधा-कृष्ण की प्रेम और भक्ति परंपरा से गहराई से जुड़े हैं। सूरदास और रसखान जैसे कवियों की रचनाओं में भी होली और कृष्ण-लीला के प्रसंग मिलते हैं, जो ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा की समृद्धि को दर्शाते हैं।



